डाक से आई चार राखियाँ और वापस लौट आया भाई का रिश्ता
डाक से आई चार राखियाँ और वापस लौट आया भाई का रिश्ता
यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि एक ऐसी घटना की है जो रिश्तों की सच्चाई पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है।
रक्षाबंधन आने वाला था। चारों बहनें अपने भाई से बहुत दूर रहती थीं। परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि वे हर बार की तरह इस बार भी भाई के घर जाकर उसकी कलाई पर राखी नहीं बाँध सकती थीं।
लेकिन बहनें दूरी को अपने प्यार के बीच नहीं आने देना चाहती थीं।
चारों ने मिलकर बाजार से राखियाँ खरीदीं। किसी ने अपने भाई के लिए पसंदीदा मिठाई रखी, किसी ने छोटा-सा उपहार रखा और किसी ने राखी के साथ एक भावुक-सा संदेश लिख दिया।
फिर चारों बहनों ने अपनी राखियाँ एक पैकेट में रखीं और डाक से भाई के घर भेज दीं।
उन्हें पूरा विश्वास था कि कुछ दिनों बाद भाई का फोन आएगा—
“राखी मिल गई बहनों… बहुत याद आ रही है तुम सबकी।”
लेकिन फोन नहीं आया।
रक्षाबंधन का दिन आया और बहनें सुबह से ही डाकिए का इंतजार करने लगीं कि शायद भाई की तरफ से कोई संदेश या मिठाई आएगी।
लेकिन दोपहर हो गई… फिर शाम हो गई।
फोन की घंटी नहीं बजी।
सबसे छोटी बहन बार-बार मोबाइल देखती रही। आखिर उसने भाई को फोन किया।
भाई ने ज्यादा बात नहीं की।
बस इतना कहा,
“अभी व्यस्त हूँ, बाद में बात करता हूँ।”
बहन ने फोन रख दिया।
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने बाकी बहनों के सामने मुस्कुराने की कोशिश की।
उसे क्या पता था कि असली दर्द अभी बाकी था।
कुछ दिनों बाद वही डाक का पैकेट वापस चारों बहनों के पास पहुँच गया।
पैकेट देखकर सब हैरान रह गईं।
जब पैकेट खोला गया तो अंदर वही चारों राखियाँ थीं।
जो राखियाँ उन्होंने अपने भाई की कलाई के लिए भेजी थीं…
वही राखियाँ बिना बंधे वापस आ गई थीं।
कुछ पल के लिए घर में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
सबसे बड़ी बहन ने राखी को हाथ में लेकर कहा—
“हमने तो सिर्फ राखी भेजी थी… पता नहीं भाई ने हमारा रिश्ता भी क्यों वापस कर दिया।”
दूसरी बहन फूट-फूटकर रोने लगी।
तीसरी बहन बोली—
“भैया ने राखी वापस कर दी, कोई बात नहीं… लेकिन बचपन की वो यादें हम कहाँ वापस करें, जो हमने उसके साथ बिताई थीं?”
और सबसे छोटी बहन उस राखी को सीने से लगाकर बैठी रही।
उसे याद आ रहा था वह बचपन…
जब भाई अपनी बहनों से लड़ता था, उनकी चोटी खींचता था, उनकी शिकायत माँ से करता था और फिर कुछ ही देर बाद उन्हीं के साथ खेलने लगता था।
स्कूल जाते समय बहनों के पीछे-पीछे चलता था।
कभी उनकी पसंद की चीज खुद नहीं खाता था और कहता था—
“ये मेरी बहन के लिए है।”
समय बीत गया।
बहनों की शादी हो गई।
भाई की भी शादी हो गई।
सबकी अपनी-अपनी जिंदगी बन गई।
लेकिन बहनों ने कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब उनके भेजी हुई राखियाँ ही उनके भाई के घर से वापस लौट आएँगी।
चारों बहनों ने उस दिन कोई झगड़ा नहीं किया।
कोई शिकायत नहीं की।
भाई को बुरा-भला नहीं कहा।
बस चुप हो गईं।
क्योंकि कभी-कभी रिश्तों में शब्द खत्म नहीं होते…
इंसान ही बोलना छोड़ देता है।
कई दिन बाद छोटी बहन ने अपनी राखी संभालकर एक डिब्बे में रख दी।
उसने कहा—
“अगले साल फिर भेजूँगी… क्योंकि बहन का प्यार तारीख देखकर नहीं बदलता।”
यह सुनकर बाकी तीनों बहनों की आँखों से आँसू निकल पड़े।
शायद उन्हें अब भी उम्मीद थी कि एक दिन उनका भाई समझेगा कि बहनें उसके घर में हिस्सा माँगने नहीं आतीं…
वे तो सिर्फ अपने भाई की कलाई पर प्यार का एक धागा बाँधने आती हैं।
रिश्ते शादी के बाद खत्म नहीं होते।
एक पत्नी का अधिकार अपनी जगह है और बहनों का रिश्ता अपनी जगह।
किसी पति को उसकी बहनों से दूर करना किसी रिश्ते की जीत नहीं होती।
क्योंकि आज अगर बहनें चुप होकर दूर चली गईं…
तो कल वही घर बहुत बड़ा होते हुए भी खाली लग सकता है।
और याद रखना—
राखी का धागा बहुत छोटा होता है,
लेकिन उसमें बचपन की हजारों यादें बंधी होती हैं।
उसे तोड़ना आसान है…
लेकिन टूटे हुए रिश्ते को फिर से जोड़ना बहुत मुश्किल।
चार राखियाँ डाक से आई थीं…
चारों वापस चली गईं।
लेकिन उनके साथ चार बहनों का बचपन भी जैसे वापस लौट गया।


No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.